सिरहन सी दौड़ गई
बाहर निकलते ही सिरहन सी दौड़ गई, शायद आज मौसम में कुछ नमी सी है। दोनों ही तरफ खामोशी सी छाई है, क्यो बर्फ़ रिश्तों में फिर जमी सी है। साथ सब हैं, चारों ओर लोग ही लोग हैं, फिर क्यों सूनी महफ़िल है, कुछ कमी सी है। वक़्त बदलेगा करवट, चीज़े बदलेगी, इसी इंतेज़ार मे साँसे थमी सी है। ख्वाब पूरे होने की आरजू है मन में, लगती आज की शाम शबनमी सी है। कुछ पाया है बहुत कुछ खो कर अब तक, हालत जीत कर भी हार चुके आदमी सी है। ________________