"सोच"
तुम सोच रहे थे बस, रेगिस्तानों के वीरानो तक,
मेरी तो नजरे हैं बरसते बादलों के ठिकानों तक।
साज तो हवा के झोंके, पानी के बहाव में भी है,
लोग क्यों उलझे रहते है ग़ज़लों और तरानों तक।
कुछ तो मिट्टी के सौंधेपन, फूलों की महक में है,
जो खींच लाती हैं हमें आज भी बागबानों तक।
सबके सपनों की एक लम्बी कहानी होती है,
शीशे के महलो से लेकर मिट्टी के मकानों तक।
एक ऎसी अदालत भी है, जो ईमान परखती है,
सिमटी नहीं रहती सिर्फ़ गवाहों और बयानों तक।
ये दिल समझा नहीं करता अहसासों की बोली को,
नहीं लाना चाहते हम लफ़्ज़ों को ज़ुबानों तक।
हर वक़्त हवाओं में, महसूस तो करोगे तुम,
ये प्यार की ख़ुशबू है जनाब, महकेंगी ज़मानों तक।
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