" ये न पूछिए मुझसे कि क्या कर रहा हूँ "
ये न पूछिए मुझसे कि क्या कर रहा हूँ
आज एक बार फिर कुछ नया लिख रहा हूँ
भीड़ भरी सड़कों पर इस अनजान शहर में
लोगो को आज कुछ अलग सा दिख रहा हूं
बहुत खाये है धोखे हर मोड़ पर यहां
दगाबाजो से फिर भी वफा कर रहा हूँ
खत्म हुआ शराफ़त का किस्सा अब
अपनी मासूमियत भी दफा कर रहा हूँ
बनाते हो मुँह क्यों सिकोडी हैं भौंहें
कहो क्या मैं कुछ बुरा कर रहा हूँ
देखे हैं जो सपने कई रातों को जागकर
मैं बस अब उन्हें ही पूरा कर रहा हूँ
चल रहा था मैं खुद जिस उल्टे रास्ते
इंसानियत के नाते दूसरों को मना कर रहा हूं
इस खुदगर्ज दुनिया को देख कर लगता है
इस ज़िन्दगी को बेवजह फना कर रहा हूं
बुजुर्गों के कदमों में सिर को झुका कर
दुआओं की ये दौलत जमा कर रहा हूँ
जलकर ही सही दूसरों के काम आऊ
इसीलिए अंदर की आग को शमा कर रहा हूं
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