निकला था आज किसी से सुकून मांगने
निकला था आज किसी से सुकून मांगने,
वो खुद हाथ फैलाए खड़ा है उससे क्या माँगू।
जो मंज़िल की तलाश में इधर-उधर भटक रहा,
उसका हमसफ़र बनूँ या उससे सीधा पता माँगू।
दर्द में वो और मैं दोनों ही नजर आते हैं,
उसे मरहम दूँ या मैं अपने दर्द की दवा माँगू।
खुद गमजदा होकर जो दूसरों के गम बांटे,
उसके लिए दुआ माँगू या उससे दुआ माँगू।
जिसकी ज़िन्दगी अंधेरों में कट रही हो,
उसको चिराग दूँ या फिर उससे ही नूर माँगू।
अरे इतना भी खुद-गर्ज नहीं है 'ये दिल' ,
दूसरों के दुख अनदेखा कर खुशी का दरिया माँगू।
हैरान हूँ उस इन्सान की हस्ती देखकर,
अब बस उसकी रूह से जुड़ने का जरिया मांगू।
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