ज़िन्दगी

 लोगो को देखने के नजरिये तो बदल,

इस ज़िन्दगी को अब नया-सा मोड़ दे।


कर भरोसा ऊपर वाले पर भी जरा,

इस कश्ती को एक बार भंवर में छोड़ दे।


ज़िन्दगी के इन सारे मसलों को देख कर,

समय ले पर जरा हल कोई बेजोड़ दे।


हौसले की इक नई इबारत तू लिख,

बेवजह डर की सारी हदें अब तोड़ दे।


इंसान की परख तो तू जानता ही है यहां,

किसी नेक दिल से अब ये रिश्ता जोड़ दे।


कब तक बर्दाश्त करेगा तू ज़ुल्मो सितम,

अपने सोये ज़मीर को थोड़ा झिंझोड़ दे।


जिसमें जीत कर भी केवल हार ही है,

भला क्यों इस ज़िन्दगी को ऐसी होड़ दे।


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