चेहरे की चमक छुपा नहीं पाते हैं हम

 चेहरे की चमक छुपा नहीं पाते हैं हम,

जब कभी ख़्यालों में तू उतरता है।


शामो सुबह का भी अंदाजा नहीं रहता,

वक़्त भी कुछ झूम कर गुज़रता है


 इस तरह क्यो देखते हैं मुझे सब

 दर्द से परेशान आदमी यूं ही बिखरता है

  

यादे तेरी जलती हुई शमा की तरह है

मन भी अब पतंगे सा तवाफ़ करता है


इक परिंदा है यूं ही उड़ता रह शान से तू

 हर इक डाल पर ना जाने क्यों ठहरता है

 

बदला तो कुछ भी नजर नहीं आता अब भी,

क्यू आज तू अपनी ही बात से मुकरता है

 

पहले तो कहते ना थके कि तू हमारा है,

फिर आज क्यू तू ऐसे मुंह फेरे गुजरता है


कुछ ज्यादा ही मासूमियत भरी थी दिल में

कौन इस क़दर डूबकर प्यार करता है


तवाफ़:- किसी चीज़ के चारों तरफ़ चक्कर लगाना। 


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