"आप "

 "आप "



राते खामोश थी, शायद दिन भी चुपचाप थे, 

जिंदगी का असली मकसद सच कहूं तो आप थे। 


घंटों जिन पर बाते करते ऐसे किस्से बेहिसाब थे, 

रब ने जिनको हम तक भेजा, कोई और नही वो आप थे। 


दिशा हीन थे शब्द भी सारे, अधूरी लिखी किताब थे, 

जिसने इसको पूर्ण किया वह बाकी पन्ने आप थे। 


आपके आने से पहले भी चल रही थी जिंदगी, 

पर भला वह क्या जिंदगी जिसमें न शामिल आप थे । 


नजरिया बदला, अब हर छोटी बात को सोचूं, 

वरना मसलों को लेकर हम बेतक्कलुफ़, हाजिरजवाब थे। 


मिट्टी की दीवारे थी, बेरंग सा मेरा मकान बना था, 

घर-बार मेरे को स्वर्ग बनाए, इतने काबिल आप थे । 


अलसायीं सुबहो को जिसे ख्वाबों में देखा , 

साथ मेरे यूँ बाहे थामे,वो धुंधला साया आप थे। 

 

हमको खुद पर नाज है, जो किस्मत मे जनाब थे, 

सुबह हुई और आँख खुली तो गरम चाय और आप थे। 

~~~~~~

✒️✒️


Comments

Popular posts from this blog

"घर" by पियूष मिश्रा

"गलतफहमी"

"वक़्त"